नेपाल में हुई बड़ी तबाही के पीछे की ये थी असली वजह : स्टडी रिपोर्ट

नेपाल पिछले महीने आई बाढ़ से हुए नुकसान के लिए संयुक्त राष्ट्र के एक फंड से आर्थिक मदद लेने की योजना बना रहा है. इसके लिए बाढ़ को जलवायु परिवर्तन से जोड़ने वाली एक नई स्टडी का सहारा लिया जाएगा. मिली जानकारी के मुताबिक़, नेपाल संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों की मदद करने वाले ‘फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ से लगभग 20 मिलियन डॉलर का दावा करने की उम्मीद कर रहा है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, बुधवार तक नेपाल में इस आपदा में लगभग 1,400 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6,150 लोग अभी भी लापता हैं. वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन नामक शोध समूह द्वारा गुरुवार को प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि पिछले महीने नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी बाढ़ लाने वाले चट्टान और बर्फ़ के हिमस्खलन में जलवायु परिवर्तन एक संभावित योगदान वजह थी.

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‘सैटेलाइट और ड्रोन इमेजेस के साथ रिपोर्ट तैयार’

इस अध्ययन की सह-लेखिका, इंपीरियल कॉलेज लंदन की जलवायु विज्ञानी डॉ. फ्रीडेरिक ओटो ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने आपदा के हालात पैदा करने में भूमिका निभाई.” नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती कस्बों और गांवों में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने कहर बरपाया, जिससे हज़ारों घर नष्ट हो गए, एनर्जी इंफ़्रास्ट्रक्चर तबाह हो गए और हज़ारों लोग मारे गए या लापता हो गए.

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय के नेपाल स्थित हिस्से में मौजूद लांगटांग लिरुंग पर्वत की चोटी के पास चट्टान और ग्लेशियर के ढहने के कारण बाढ़ आई थी. अध्ययन में कहा गया है कि यह आपदा बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और पहले से मौजूद भूवैज्ञानिक कमज़ोरियों के कारण हुई “संयुक्त घटना” का परिणाम थी. अध्ययन के मुताबिक़, जलवायु पर मानवीय प्रभाव के कारण क्षेत्र में जुलाई और अगस्त के महीनों में तापमान लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक था.

इस बीच, इस क्षेत्र में ग्लेशियर भी प्रति वर्ष लगभग आधा मीटर (1.6 फीट) तक कम हो रहे थे, जिससे मौजूदा दरारें कमज़ोर हो सकती हैं और अस्थिरता बढ़ सकती है. पिछले साल अक्तूबर और नवंबर में हुई भारी बर्फ़बारी ने भी इस साल की शुरुआत में पिघले हुए पानी की मात्रा में काफ़ी वृद्धि की.

अध्ययन के मुताबिक़, जलवायु परिवर्तन इस आपदा का एकमात्र कारण नहीं था, लेकिन इसने “पहले से मौजूद भू-वैज्ञानिक स्थिति पर असर डाला” था. बाढ़ के मद्देनज़र, नेपाल के नेताओं ने कहा है कि देश को पुनर्निर्माण के लिए लगभग 5 अरब डॉलर की आवश्यकता है.

संयुक्त राष्ट्र का फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज, जो पिछले साल ही शुरू हुआ, देशों से ऐसे सुबूत देने की उम्मीद करता है जो यह साबित करते हों कि उन्हें जलवायु परिवर्तन की वजह से नुक़सान हुआ है. नेपाली अधिकारी फ़ंड के लिए सैटेलाइट और ड्रोन इमेजेस के साथ प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार कर रहे थे.

लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन की रिपोर्ट अब उनके इस दावे का सबसे मज़बूत सबूत है कि जलवायु परिवर्तन लांगटांग लिरुंग में चट्टान और बर्फ़ के ढहने में एक महत्वपूर्ण वजह थी. नेपाल के कृषि, वन और पर्यावरण मंत्रालय के प्रवक्ता महेश्वर ढकाल ने कहा, “यह रिपोर्ट हमारे दावे का मुख्य आधार होगी क्योंकि इसमें इस आपदा में जलवायु की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया गया है.”

स्टडी से और क्या पता चला?

वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन के अध्ययन के अनुसार, 2015 में नेपाल में आए 7.8 तीव्रता के भूकंप और उससे आए हिमस्खलन ने भी चट्टानी संरचना को कमज़ोर कर दिया होगा. हालांकि अध्ययन में कहा गया है कि वह हालिया आपदा पर भूकंप के सटीक प्रभाव की पुष्टि नहीं कर सकता है.

यह अध्ययन किसी पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित नहीं हुआ है. वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन वेबसाइट के अनुसार, मौसम की इन चरम घटनाओं का विश्लेषण करने के लिए उनकी सभी स्टडीज़ एक ही पीयर-रिव्यूड तरीके का इस्तेमाल करती हैं. इसके निष्कर्ष आपदा के तुरंत बाद अन्य विशेषज्ञों द्वारा दिए गए सुझावों को और पुष्ट करते हैं. इससे पहले कुछ लोगों ने यह भी बताया था कि हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ही हिमस्खलन हुआ होगा.

डंडी विश्वविद्यालय के ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. साइमन कुक ने पिछले महीने बीबीसी को बताया कि हालांकि किसी एक घटना को जलवायु परिवर्तन से जोड़ना मुश्किल है, लेकिन “जलवायु परिवर्तन आख़िरकार इन ऊंचे पर्वतीय वातावरणों को अस्थिर कर देता है.”

कुक ने यह भी बताया कि वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन रिपोर्ट हालिया आपदा के कारणों के बारे में एक “बेहद सार्थक अध्ययन” था. और हालांकि यह “कुछ ठोस सबूत प्रदान करता है कि जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख वजह थी”, उन्होंने कहा, “हम अभी तक यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि यह वास्तव में कैसे हुआ. इसमें शामिल प्रक्रियाओं के बारे में अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है… और हम भविष्य में इस तरह की घटनाओं की प्रारंभिक चेतावनी देने के लिए इन उच्च पर्वतीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए क्या कर सकते हैं.”

कितनी राशि हासिल कर पाएगा नेपाल?

नेपाली अधिकारियों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया से अपील की है, उनका कहना है कि नेपाल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सबसे कम योगदान देने वाले देशों में से एक है, फिर भी दुनिया के बढ़ते तापमान के प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील स्थानों में से एक है. नेपाली प्रधानमंत्री के रूप में बालेंद्र शाह अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में अगले सप्ताह न्यूयॉर्क जा रहे हैं. जहां वो संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेंगे और हाल ही में आई आपदा और जलवायु को लेकर बात करने के लिए उपस्थित होंगे.

ब्लूमबर्ग एनईएफ़ की जलवायु अनुकूलन विशेषज्ञ दान्या लियू ने कहा, “नेपाल ने बार-बार ‘मुआवज़ा’ शब्द का इस्तेमाल बेहद ज़रूरी राहत कोष का वर्णन करने के लिए किया है. यह फ़र्क ‘प्रदूषण फैलाने वाले के भुगतान’ वाले मॉडल की ओर इशारा करता है, न कि ऐसे मॉडल की ओर जिसमें प्रभावित देश ज़्यादातर खर्च उठाते हैं और कमियों को पूरा करने के लिए मदद पर निर्भर रहते हैं.” लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या नेपाल बाढ़ प्रभावित सीमावर्ती क्षेत्रों में पुनर्निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक धनराशि जुटाने में सक्षम होगा – और वह ऐसा कितनी जल्दी कर पाएगा.

संयुक्त राष्ट्र के फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज में लगभग 120 देशों ने पहले ही दावे प्रस्तुत कर दिए हैं, जिनकी कुल राशि लगभग 3 अरब डॉलर है. लेकिन ख़बरों के मुताबिक़, इस फ़ंड में वितरण के लिए 40 करोड़ डॉलर से कुछ कम राशि आवंटित की गई है.

नेपाली अधिकारियों ने कहा है कि हालांकि उन्हें नेपाल को तेज़ी से धनराशि वितरित करने के लिए कुछ देशों से व्यापक समर्थन मिला है, वहीं अन्य देशों ने नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है. संयुक्त राष्ट्र कोष के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी दिसंबर में बैठक करने वाले हैं ताकि यह तय किया जा सके कि किन अनुरोधों को स्वीकार किया जाएगा और क्या नेपाल के लिए तुरंत फ़ैसला लिया जाएगा.

साभार : बीबीसी हिंदी

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